क्या दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ 2 करोड़ फॉलोअर्स वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का प्रदर्शन एक ऐतिहासिक ‘छात्र क्रांति’ था? या फिर यह महज़ कुछ इन्फ्लुएंसर्स का एक ‘डिजिटल तमाशा’ था?
वैसे ये ‘कॉकरोच‘ नाम कहाँ से आया? दरअसल, कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के CJI द्वारा एक मामले में बेरोजगारों के संदर्भ में ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल हुआ था, जिसे पकड़कर इस पार्टी ने अपना नाम और नैरेटिव गढ़ा।
अगर आप सोशल मीडिया और टीवी चैनलों को देखेंगे, तो आपका दिमाग चकरा जाएगा। एक तरफ आपको ऐसे वीडियो दिखेंगे जहाँ मंच पर नेता ठंडी कॉफी पी रहे हैं, पीछे पंखा झलवा रहे हैं और 39 डिग्री की गर्मी से बचकर AC कारों में भाग रहे हैं। वहीं, दूसरी तरफ आपको ऐसे वीडियो मिलेंगे जहाँ देश के कोने-कोने से आए मजबूर माता-पिता, असली छात्र और सोनम वांगचुक जैसे शिक्षाविद न्याय की भीख मांग रहे हैं।
मीडिया चैनल के अलग मत क्यों?
एक पत्रकार कह रहा है कि ये सिर्फ ‘यूट्यूबर्स का एजेंडा’ था, तो दूसरा पत्रकार कह रहा है कि ‘मेनस्ट्रीम मीडिया ने जानबूझकर इस आंदोलन को ब्लैकआउट कर दिया।’ आखिर सच क्या है? आज हम किसी एक साइड की बात नहीं करेंगे। आज बात होगी पूरे 360 डिग्री एंगल की।
आज हम इन्फ्लुएंसर्स, मीडिया, नैरेटिव, न्यूज़, ग्राउंड रिपोर्ट… सब को ध्यान में रखते हुए आपको इस प्रोटेस्ट का वो निष्पक्ष सच बताएंगे, जो शोर-शराबे के बीच कहीं दब गया है। फैसला आज आपको करना है।
क्या मेन मुद्दा भटक गया?
सबसे पहले बात करते हैं उस तस्वीर की, जिसने सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा मीम्स बनवाए और इस आंदोलन की साख पर सवाल खड़े किए। प्रोटेस्ट का कुछ वीडियो देखकर समझ ही नहीं आ रहा था कि ये छात्रों का आंदोलन है, जेएनयू का कोई पुराना धरना है, या फिर कोई स्टैंड-अप कॉमेडी का ओपन माइक?
जब आप 22 मिलियन (2 करोड़) की ताकत का दावा करते हैं, तो उम्मीद की जाती है कि पूरा जंतर-मंतर भर जाएगा। लेकिन असलियत क्या थी? 2 करोड़ फॉलोअर्स वाली पार्टी के बुलावे पर 2000 लोग भी नहीं जुटे! और मजे की बात देखिए, उन 2000 में से भी 500 से ज्यादा तो सिर्फ माइक और कैमरा लिए यूट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स थे, जो सिर्फ तमाशा देखने और अपने लिए कंटेंट बनाने आए थे।
उम्मीद थी कि मंच पूरी तरह से छात्रों का होगा। लेकिन असलियत में मंच ‘हाईजैक’ हो गया। जिन तीन मुख्य प्रवक्ताओं को चेहरा बनाया गया, उनका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड खंगाला गया तो वो ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) से जुड़े निकले।
नतीजा क्या हुआ? मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस प्रदर्शन से पूरी तरह किनारा कर लिया और इसे छात्रों का आंदोलन कम और ‘AAP 2.0’ का प्रायोजित इवेंट ज्यादा माना गया। वहां कुछ ऐसे इन्फ्लुएंसर्स पहुँच गए जिन्हें NEET या CBSE की फुल फॉर्म तक शायद ना पता हो, लेकिन मंच से ‘ईवीएम हैकिंग’, ‘आरएसएस मुर्दाबाद’, ‘उमर खालिद की रिहाई’ और ‘एलजीबीटी अधिकारों’ के नारे लगने लगे।
जिस शिक्षा मंत्री (धर्मेंद्र प्रधान) का इस्तीफा मांगने ये लोग आए थे, कई नेताओं को उनका नाम तक नहीं पता था। कैमरे पर जब पूछा गया तो एक महाशय ‘अमित प्रधान‘ का इस्तीफा मांगते हुए नज़र आए।
और सबसे बड़ी निराशा तब हुई, जब ‘क्रांति’ की बात करने वाले कुछ चेहरे 40 डिग्री की गर्मी नहीं झेल पाए। जो लोग इस देश का सिस्टम बदलने निकले थे, उनका खुद का सिस्टम गर्मी से हैंग हो गया। पुलिस ने शाम 5 बजे तक प्रदर्शन की परमिशन दी थी, लेकिन ‘वी डोंट नीड परमिशन’ चिल्लाने वाले 3:30 बजते-बजते गर्मी से बेहाल होकर AC गाड़ियों में बैठ कर निकल लिए।
हाथ में ठंडी कॉफी और बगल में एक बुजुर्ग से पंखा झलवाना… इसने आम जनता को यह मैसेज दिया कि ये मिडिल क्लास छात्रों का नहीं, बल्कि ‘वीआईपी इन्फ्लुएंसर्स’ का पीआर स्टंट था। असली छात्र जो जनरल डिब्बे में धक्के खाकर पेपर देने जाता है, वो उस मंच के माइक से गायब दिखा।
रील की दुनिया में भौकाल काटना अलग बात है गुरु, लेकिन जब 40 डिग्री की धूप में डामर की सड़क पर पैर टिकता है ना… तब पता चलता है कि असली संघर्ष क्या होता है।
लेकिन रुकिए, कहानी का दूसरा पहलू इससे बिल्कुल अलग है। अगर कुछ इन्फ्लुएंसर्स तमाशा कर रहे थे, तो इसका मतलब यह नहीं कि पूरी भीड़ फेक थी।ग्राउंड पर मौजूद स्वतंत्र पत्रकारों और कैमरे की नज़रों ने एक और सच दिखाया। वहां भीड़ में महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और यूपी से आए वो आम लोग, बच्चे और बुजुर्ग भी मौजूद थे, जिनका सिस्टम ने वाकई शोषण किया है। वो वहां किसी के फॉलोअर बनकर नहीं, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य के लिए आए थे।
CJP Protest का सच क्या है?
इस दौरान मीडिया का रवैया सबसे ज़्यादा सवालों के घेरे में रहा। देश के इतने बड़े छात्र मुद्दे को मेनस्ट्रीम टीवी चैनलों ने लगभग पूरी तरह से ‘इग्नोर’ कर दिया। प्रदर्शनकारियों में इतना गुस्सा था कि उन्होंने बड़े चैनलों के रिपोर्टरों को ‘गोदी मीडिया’ के नारे लगाकर वहां से हटने पर मजबूर कर दिया। कुछ चैनल वालों को अपने माइक से ID holder तक निकालना पड़ा।
और तो और, कुछ यूट्यूबर और रोस्टर्स वहां सिर्फ इसलिए गए थे ताकि वो प्रदर्शनकारियों से कुछ सवाल पूछकर उन्हें बेवकूफ साबित कर सकें और अपने वीडियो वायरल कर सकें। इस पहलू से देखें, तो एक कोशिश यह भी थी कि कैसे भी करके छात्रों के इस प्रदर्शन को ‘डिरेल’ (भटका) किया जाए। लेकिन एक सच यह भी है कि वहां कुछ लोग ऐसे भी थे जिनका इस आंदोलन से कुछ लेना देना नहीं था, सिर्फ देखने पहुंच गए थे।
न्यूज रिपोर्ट क्या कहती हैं
जब हम न्यूज़ रिपोर्ट्स खंगालते हैं, तो पता चलता है कि इस आंदोलन को सिर्फ ‘हवाबाजी’ कहना भी गलत होगा। यह दरअसल ‘Gen-Z’ (आज की युवा पीढ़ी) के गुस्से का एक नया और आधुनिक तरीका था। इन्होंने कॉकरोच मास्क पहनकर एक तंज कसा था:
We asked for Make in India, you gave us Leak in India.
इस प्रदर्शन की 5 बेहद स्पष्ट मांगें थीं:
- धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।
- परीक्षा व्यवस्था (NEET, CUET) में पूरी पारदर्शिता।
- डिजिटल एजुकेशन से पहले सही ट्रेनिंग।
- पेपर लीक से डिप्रेशन में आकर खुद को नुकसान पहुंचाने वाले छात्रों के लिए जवाबदेही।
- मणिपुर के छात्रों की शिक्षा बहाली।
इस प्रदर्शन में मशहूर शिक्षाविद सोनम वांगचुक का शामिल होना इस बात का प्रमाण है कि मुद्दा हवा-हवाई नहीं था। पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने हाथ में बाबा साहेब अंबेडकर की किताब लेकर साफ कहा कि ‘छात्रों को सिस्टम से डरना बंद करना होगा।’ इसके अलावा विपक्ष (AAP, सपा, शिवसेना) ने भी इस आंदोलन को अपना खुला समर्थन दिया। सरकार ने भी समझदारी दिखाई और लाठीचार्ज के बजाय उन्हें शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने दिया।
इन सारी बातों को मिलाकर अंतिम सच क्या निकलता है?
सच यह है कि ‘संदेश (Message) बिल्कुल सही था, लेकिन संवाहक (Messengers) कुछ हद तक गलत थे।’
NEET परीक्षा में हुई धांधली एक ज़मीनी सच्चाई है। छात्रों का गुस्सा 100% जायज़ है। जो लोग दूर-दराज से अपने हक के लिए आए, वो असली थे। लेकिन गलती वहां हुई जहाँ सोशल मीडिया की दुनिया को रियल दुनिया समझ लिया गया। जब भी किसी आंदोलन की गंभीरता खत्म हो जाती है और वो एक ‘मीम’ बन जाता है, और उस दिन आंदोलन हार जाता है।
जंतर-मंतर पर जो हुआ, उससे सबसे बड़ा फायदा किसे हुआ? फायदा हुआ सरकार को, NTA को और शिक्षा माफियाओं को। सोचिए, टीवी पर बहस होनी चाहिए थी कि ‘धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा कब देंगे?‘ लेकिन शाम होते-होते बहस इस पर हो रही थी कि ‘नेताजी पंखा कैसे झलवा रहे हैं!’ सिस्टम वाले तो ताली बजा रहे होंगे कि चलो, इन्होंने खुद ही अपने मुद्दे को जोकर बना दिया।
यह प्रदर्शन एक बहुत बड़ा सबक है। अगर उस मंच पर वो लड़का खड़ा होकर बोलता, जिसने जवानी के तीन साल 10×10 के कमरे में दाल-चावल खाकर निकाल दिए… अगर वहां वो पिता खड़ा होता जिसने किसानी का कर्ज लेकर बेटे की फीस भरी थी… तो यकीन मानिए, सरकार की रूह कांप जाती। देश का हर बाप उस लड़के के साथ खड़ा होता।
छात्रों को न्याय मिलना चाहिए, लेकिन अगली बार जब कोई मंच सजे, तो माइक किसी ‘लाइक्स और फॉलोअर्स’ बटोरने वाले के हाथ में नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ उस छात्र के हाथ में होना चाहिए जिसका पेपर लीक हुआ है।आपकी नज़रों में यह प्रदर्शन पास हुआ या फेल? क्या इससे सरकार पर दबाव बनेगा, या यह सिर्फ इंटरनेट का मीम बनकर रह जाएगा? कमेंट बॉक्स खुला है, अपनी राय ज़रूर रखें। धन्यवाद!
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