दोस्तों आज कल एथेनॉल को लेकर देश में एक बड़ी बहस चल रही है, जो की है एथेनॉल को बनाने में पानी को लेकर। कोई कह रहा है 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 10 हजार लीटर पानी लगता है तो बता रहा है कि 3 से 5 लीटर पानी लगता है। बात यही नहीं है दोस्तों इस पर जो सवाल उठा रहा कुछ लोग उसे भी गलत ठहरा रहे हैं। तो इसी को लेकर आज हम आपके सामने दो रिसर्च पेपर से कुछ डेटा निकाल कर लाये हैं जो कि पहला है नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट, जो हमें इसके फायदे गिनाती है। और दूसरी तरफ है PNAS (2009) की ग्लोबल साइंटिफिक रिपोर्ट जो इसके भयानक नुकसानों की चेतावनी देती है।
दोस्तों भारत सरकार एक बहुत बड़ा मिशन चला रही है, जिसका लक्ष्य है आपके पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाना। इसे E20 कहा जाता है। सरकार कह रही है कि इससे देश के 30,000 करोड़ रुपये बचेंगे और किसानों की जेब में पैसा जाएगा। लेकिन… कहानी का एक दूसरा पहलू भी है। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि पेट्रोल बचाने के चक्कर में हम अपना सबसे कीमती खजाना यानी ‘पीने का पानी’ खत्म कर रहे हैं।
आज के इस डीप-रिसर्च वीडियो में हम दो बेहद अहम और एक-दूसरे के बिल्कुल उलट रिपोर्ट्स का ऑपरेशन करेंगे। एक तरफ है भारत के नीति आयोग की 2021 की रिपोर्ट, जो हमें इसके फायदे गिनाती है। और दूसरी तरफ है PNAS (2009) की ग्लोबल साइंटिफिक रिपोर्ट, जो इसके भयानक नुकसानों की चेतावनी देती है। दोस्तों PNAS (Proceedings of the National Academy of Sciences) रिपोर्ट संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) की सबसे प्रतिष्ठित और आधिकारिक वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित हुई है।
यह शोध मुख्य रूप से नीदरलैंड (Netherlands) की मशहूर ‘ट्वेंटे यूनिवर्सिटी’ (University of Twente) और यूनेस्को के ‘आईएचई इंस्टीट्यूट फॉर वॉटर एजुकेशन’ (UNESCO-IHE) में तैयार किया गया था।
इस लेख में हम आसान भाषा में समझेंगे कि एथेनॉल क्या है, इसे बनाने में कितना पानी लगता है, और क्या सच में भारत पेट्रोल बचाने के चक्कर में ‘पानी के दिवालियेपन’ की तरफ बढ़ रहा है?
What is Ethanol?
सबसे पहले एक आम आदमी की भाषा में समझते हैं कि एथेनॉल क्या है। एथेनॉल असल में एक तरह का अल्कोहल ही है। जैसे गन्ने के रस या अनाज को सड़ाकर पीने वाली शराब (Liquor) बनती है, बिल्कुल वैसे ही मशीनों में खास तरीके से सड़ाकर (Fermentation) यह एथेनॉल बनता है, जो इतना शुद्ध होता है कि इससे गाड़ियों का इंजन चल सकता है।
अब बात करते हैं नीति आयोग की रिपोर्ट (Roadmap for Ethanol Blending in India 2020-25) की। इस सरकारी रिपोर्ट को भारत का ‘आर्थिक रक्षा कवच’ माना जा रहा है। आखिर सरकार ऐसा क्यों कर रही है?
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार इसके 3 बहुत बड़े फायदे हैं:
विदेशों पर निर्भरता और पैसा (The Economic Angle of Ethanol)
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। 2020-21 में हमने इसके लिए 551 बिलियन डॉलर (यानी लाखों करोड़ रुपये) विदेशों को दिए। अगर हम पेट्रोल में 20% अपना देसी एथेनॉल मिला दें, तो हमें बाहर से 20% कम पेट्रोल खरीदना पड़ेगा। रिपोर्ट कहती है कि इससे भारत को हर साल 4 बिलियन डॉलर यानी करीब 30,000 करोड़ रुपये की सीधी बचत होगी। यह पैसा अरब देशों में जाने के बजाय हमारे देश में रहेगा।
किसानों की कमाई (The Farmer Angle of Ethanol)
हमारा देश कृषि प्रधान है। कई बार बंपर पैदावार होती है, तो गन्ने या चावल का सही दाम नहीं मिलता। अनाज गोदामों में सड़ जाता है। सरकार का प्लान है कि इस अतिरिक्त गन्ने और सड़ रहे अनाज को फैक्ट्रियों में भेजकर एथेनॉल बना लिया जाए। इससे किसानों को उनके खराब अनाज का भी पैसा मिल जाएगा।
कम प्रदूषण (The Environmental Angle of Ethanol)
पेट्रोल जब जलता है, तो बहुत धुआं और कार्बन छोड़ता है। एथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा साफ जलता है, जिससे प्रदूषण कम होता है।
नीति आयोग ने यह भी बताया कि इस 20% के लक्ष्य को पाने के लिए हमें लगभग 1000 करोड़ लीटर एथेनॉल चाहिए होगा। सुनने में यह प्लान एकदम ‘परफेक्ट’ लगता है। पैसा भी बच रहा है, किसान भी अमीर हो रहा है और धुआं भी कम हो रहा है। लेकिन इस पूरी 72 पन्नों की रिपोर्ट में एक शब्द को बहुत सफाई से किनारे कर दिया गया… और वो शब्द था ‘पानी’।
तस्वीर का दूसरा पहलू हमें दिखाती है साल 2009 में छपी एक बहुत ही प्रतिष्ठित वैज्ञानिक रिपोर्ट—PNAS (Proceedings of the National Academy of Sciences)। यह रिपोर्ट दुनिया भर के वैज्ञानिकों की आंखें खोलने वाली थी। इस रिपोर्ट ने पहली बार दुनिया को एक शब्द से डराया: ‘Water Footprint’ (वाटर फुटप्रिंट)।
आसान भाषा में वाटर फुटप्रिंट का मतलब है कि किसी भी एक चीज़ को बनाने में ‘शुरू से लेकर अंत तक’ कुल कितना पानी खर्च हुआ। PNAS की रिपोर्ट ने दुनिया की 12 प्रमुख फसलों का टेस्ट किया। और जो डेटा सामने आया, वह रोंगटे खड़े करने वाला था।
- पानी की बेतहाशा बर्बादी: 1 लीटर एथेनॉल (बायोफ्यूल) बनाने के लिए औसतन 1,400 लीटर से लेकर 20,000 लीटर तक ताजे पानी की खपत होती है। सोचिए, आपकी गाड़ी सिर्फ 1 लीटर पेट्रोल में E20 मिलाकर कुछ किलोमीटर चलेगी, लेकिन उसे बनाने में हज़ारों लीटर पानी स्वाहा हो गया!
- फसलों की तुलना: रिपोर्ट बताती है कि अगर आपको एथेनॉल बनाना ही है, तो चुकंदर (Sugar beet) और आलू से बनाओ, क्योंकि इनमें सबसे कम पानी लगता है। लेकिन अगर आप इसे गन्ने (Sugarcane) या ज्वार (Sorghum) से बनाते हैं, तो यह पानी की बर्बादी का सबसे बुरा तरीका है।
PNAS की रिपोर्ट साफ शब्दों में चेतावनी देती है कि अगर पूरी दुनिया एथेनॉल के पीछे भागने लगी, तो आने वाले समय में दुनिया में ‘पीने के पानी’ और ‘खाने के अनाज’ की इतनी कमी हो जाएगी कि त्राहि-त्राहि मच जाएगी। रिपोर्ट यह सलाह देती है कि फसलों को सड़ाकर तरल ईंधन (Liquid fuel) बनाने से अच्छा है कि फसलों के कचरे को सीधा जलाकर बिजली बना ली जाए और इलेक्ट्रिक गाड़ियां (EV) चलाई जाएं। वह ज्यादा सस्ता और पर्यावरण के लिए बेहतर है।
अब यहीं से आपके मन में एक बहुत वाजिब सवाल उठ रहा होगा। भाई, 1 लीटर एथेनॉल के लिए 1400 – 20000 लीटर पानी? आखिर इतना पानी जाता कहाँ है? क्या फैक्ट्रियों में नल खुले छोड़ दिए जाते हैं?
1 लीटर एथेनॉल बनाने के लिए कितना लीटर पानी लगता है?
इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए जैसे आप घर में रोटी बनाते हैं। एक रोटी बनाने के लिए आप आटे में आधा गिलास पानी गूंथते हैं। लेकिन क्या उस एक रोटी में सिर्फ आधा गिलास पानी लगा? नहीं! उस गेहूं को खेत में बोने से लेकर चार महीने तक जो बारिश हुई और सिंचाई हुई, वो हजारों लीटर पानी भी तो उसी रोटी में जुड़ा है! एथेनॉल का गणित भी बिल्कुल ऐसा ही है।
कुल पानी को 2 हिस्सों में बांटा जाता है:
खेत का चरण (Agricultural Phase) – 98% पानी की खपत
अगर गन्ने से एथेनॉल बन रहा है, तो कुल पानी का 98 से 99% हिस्सा केवल खेत में खर्च हो जाता है। गन्ना एक ‘Water Guzzling’ (पानी पीने वाली) फसल है। इसे खेत में करीब 12 महीने तक खड़ा रखना पड़ता है। इस दौरान इसे लगातार पानी चाहिए। धूप से जो पानी भाप बनकर उड़ता है (Evaporation) और जो पौधा अपने विकास के लिए पीता है, वह सब इसी 98% में आता है।
कारखाने का चरण (Industrial Phase) – 2% पानी की खपत
अब गन्ना कटकर जब फैक्ट्री (Distillery) में पहुंचता है, तब शुरू होता है कारखाने का काम। यहाँ 1 लीटर एथेनॉल बनाने में सिर्फ 3 से 15 लीटर पानी ही लगता है। अब यह 15 लीटर पानी फैक्ट्री में कहाँ-कहाँ खर्च होता है? इसके मुख्य 4 काम हैं:
- किण्वन (Fermentation): “गन्ने के रस या अनाज के पाउडर को खमीर (Yeast) के साथ मिलाया जाता है ताकि वह सड़कर अल्कोहल बन सके। इस घोल को बनाने के लिए पानी चाहिए।
- बॉयलर और भाप (Boilers): “फैक्ट्री की मशीनों को चलाने और इस घोल को उबालकर शुद्ध एथेनॉल निकालने के लिए बहुत सारी भाप (Steam) की जरूरत होती है। भाप बनाने के लिए पानी चाहिए।
- कूलिंग टावर (Cooling): “जब लिक्विड उबलता है, तो उसे ठंडा करने के लिए बड़े-बड़े कूलिंग टावर लगे होते हैं, जहाँ पानी का इस्तेमाल होता है।
- सफाई (Washing): “रोजाना टंकियों, मशीनों और फर्श को धोने के लिए पानी लगता है।
यहाँ भारत के लिए एक अच्छी खबर है। हमारे देश के नियम बहुत सख्त हो गए हैं। आजकल भारत की जो नई फैक्ट्रियां बन रही हैं, वो ‘ZLD’ (Zero Liquid Discharge) तकनीक पर काम करती हैं। इसका मतलब है कि फैक्ट्री का कोई भी गंदा पानी बाहर नाले में नहीं जाएगा। उसी गंदे पानी को मशीनों से साफ करके वापस बॉयलर और सफाई में इस्तेमाल कर लिया जाता है।
इस तकनीक की वजह से भारत की फैक्ट्रियों में अब 1 लीटर एथेनॉल बनाने में 15 लीटर के बजाय सिर्फ 2 से 4 लीटर ताजा पानी ही लगता है। यानी फैक्ट्रियों ने तो अपना काम कर दिया, पानी बचा लिया। लेकिन असली मुसीबत की वजह खेतों में है!
अब हम इन दोनों रिपोर्ट्स (नीति आयोग और PNAS) को मिलाकर भारत की जमीनी हकीकत पर रखते हैं।
Ethanol बनाने के नुकसान
नीति आयोग ने E20 का लक्ष्य रखा। इसे पूरा करने के लिए भारत सरकार किस चीज़ पर सबसे ज्यादा निर्भर है? गन्ना और चावल! PNAS रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने से ज्यादा पानी पीने वाली फसल कोई और नहीं है। क्या आप विरोधाभास (Contradiction) देख रहे हैं? जिस फसल से एथेनॉल बनाना पर्यावरण के लिए सबसे नुकसानदेह है, भारत उसी फसल पर सबसे ज्यादा दांव लगा रहा है।
भारत में गन्ने की सबसे ज्यादा खेती महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में होती है। महाराष्ट्र के कई इलाके पहले से ही भयानक सूखे का सामना कर रहे हैं। वहाँ के ग्राउंडवाटर (जमीन के नीचे का पानी) का स्तर खतरनाक रूप से नीचे जा चुका है।
सोचिए, अगर किसान एथेनॉल से ज्यादा पैसा कमाने के लालच में और ज्यादा गन्ना उगाने लगे, तो वो पानी कहाँ से लाएंगे? वो जमीन में और गहरे बोरवेल खोदेंगे। एक समय ऐसा आ सकता है जब हमारी गाड़ियों की टंकियां तो एथेनॉल से भरी होंगी, लेकिन हमारे पीने के मटके खाली हो जाएंगे। और ये समस्या कब होगी जब किसान ज्यादा पैसा कमाने के लालच में सिर्फ एथेनॉल वाली फसलों का उत्पादन करना चाहेगा।
दूसरी समस्या है खाना बनाम ईंधन (Food vs Fuel)। भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। अगर हम अपनी उपजाऊ जमीन और पानी का इस्तेमाल गाड़ियों का ईंधन उगाने के लिए करने लगे, तो हम खाएंगे क्या? अगर अनाज कम उगेगा, तो बाजार में आटे और चावल के दाम आसमान छूने लगेंगे। गरीब आदमी तो गाड़ी नहीं चलाता, लेकिन उसे महंगी रोटी जरूर खरीदनी पड़ेगी।
तो क्या इसका मतलब यह है कि नीति आयोग गलत है और हमें एथेनॉल का प्लान बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं। देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए E20 ब्लेंडिंग बहुत जरूरी है। लेकिन हमें इसे ‘स्मार्ट’ तरीके से करना होगा। समाधान क्या है?
2G एथेनॉल (Second Generation Ethanol) क्या है?
समाधान है 2G एथेनॉल (Second Generation Ethanol), अभी हम खाने वाली चीजों (गन्ना, चावल) से एथेनॉल बना रहे हैं जिसे 1G (First Generation) कहते हैं। हमें जल्द से जल्द 2G तकनीक पर शिफ्ट होना होगा। 2G तकनीक में एथेनॉल फसलों से नहीं, बल्कि फसलों के कचरे (Agricultural waste) से बनता है। जैसे पंजाब और हरियाणा में धान की कटाई के बाद जो पराली बच जाती है (जिसे जलाकर प्रदूषण होता है), अगर हम उस पराली से, मकई के छिलकों से, या खराब घास-फूस से एथेनॉल बनाएं, तो इसके तीन फायदे होंगे:
- खेतों में एक्स्ट्रा पानी नहीं लगाना पड़ेगा (क्योंकि कचरे में कोई नया पानी नहीं लगता)।
- खाने का अनाज गाड़ियों के इंजन में नहीं जलेगा, इंसानों के काम आएगा।
- पराली जलने से जो दिल्ली और उत्तर भारत में धुआं होता है, वह खत्म हो जाएगा।
निष्कर्ष (Conclusion)
नीति आयोग की रिपोर्ट हमें बताती है कि एथेनॉल हमारे देश की ‘जेब’ के लिए कितना अच्छा है। वहीं PNAS की रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि एथेनॉल हमारी ‘धरती और पानी‘ के लिए कितना खतरनाक हो सकता है।
भारत आज एक दोधारी तलवार पर चल रहा है। 30,000 करोड़ रुपये बचाना एक बेहतरीन कदम है, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कल को अगर नदियां सूख गईं और भूजल खत्म हो गया, तो दुनिया का कोई भी अरबपति देश वो पानी वापस नहीं खरीद पाएगा। पैसा कमाया जा सकता है, लेकिन पानी नहीं बनाया जा सकता।
अगर इस डीप-रिसर्च वीडियो ने आपको कुछ नया सिखाया हो, तो इसे अपने दोस्तों और परिवार के साथ जरूर शेयर करें ताकि आम आदमी भी देश की नीतियों के पीछे का सच समझ सके।
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